You can find updated Android installation instructions and app information on BC Game APK India.

Ballia : बलिया से मायानगरी तक: ‘हनुमान अंश’ से जुड़े शशांक सिंह तोमर का फिल्मी सफर

फौजी परिवार से निकले शशांक ने चुनी सिनेमा की राह, अपनी फिल्म के लिए पहले छोड़ा था ‘हनुमान अंश’ में फर्स्ट एडी बनने का मौका
बलिया।
जिले के कैथवली गांव से ताल्लुक रखने वाले फिल्ममेकर शशांक सिंह तोमर ने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में अपनी अलग राह बनाई है। फिल्म ‘हनुमान अंश’ में सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में काम कर चुके शशांक के इस फिल्म से जुड़ने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। उन्हें शुरुआत में इसी फिल्म में फर्स्ट असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में जुड़ने का प्रस्ताव मिला था, लेकिन उस समय अपनी फिल्म ‘पहरेदार’ की तैयारियों में व्यस्त होने के कारण उन्होंने यह मौका छोड़ दिया था।

होली क्रॉस स्कूल से शुरू हुआ सफर
शशांक की शुरुआती शिक्षा होली क्रॉस स्कूल, बलिया से हुई। उनका पैतृक गांव कैथवली है, जबकि उनका परिवार वर्तमान में बहादुरपुर, बलिया में रहता है। शशांक का परिवार कई पीढ़ियों से भारतीय सेना से जुड़ा रहा है। उनके दादा मेजर रामेश्वर सिंह ने 1965 के भारत-पाक युद्ध में हिस्सा लिया था और वर्ष 1970 में सेना से सेवानिवृत्त हुए। उनके छोटे भाई कामेश्वर सिंह ने भी भारतीय सेना में सेवाएं दीं और 1971 के भारत-पाक युद्ध में हिस्सा लिया।
शशांक के पिता रिसालदार मेजर शैलेंद्र कुमार सिंह भारतीय सेना की 52 आर्मर्ड रेजिमेंट में अपनी सेवाएं देने के बाद सेवानिवृत्त हुए। उनके बड़े पापा विजय बहादुर सिंह और सुनील सिंह भी भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। परिवार का सेना से रिश्ता आज भी कायम है। उनके बड़े पापा के बेटे वर्तमान में भारतीय सेना में कार्यरत हैं। इस तरह दादा की पीढ़ी से लेकर आज की पीढ़ी तक परिवार का भारतीय सेना से गहरा जुड़ाव रहा है। शशांक की मां गृहिणी हैं, जबकि उनकी बहन इंजीनियर हैं और वर्तमान में बेंगलुरु में रहती हैं।
कई पीढ़ियों से सेना से जुड़े परिवार में पले-बढ़े शशांक ने अपने लिए एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने सिनेमा, लेखन और निर्देशन को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और बलिया से निकलकर मुंबई फिल्म इंडस्ट्री तक का सफर तय किया।

पहले मिला था ‘हनुमान अंश’ में फर्स्ट एडी का प्रस्ताव
अपने फिल्मी सफर के दौरान शशांक को ‘हनुमान अंश’ में फर्स्ट असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में काम करने का प्रस्ताव मिला। लेकिन उसी समय वह अपनी फिल्म ‘पहरेदार’ की कहानी और उसके निर्माण की तैयारियों में जुटे थे।
अपने प्रोजेक्ट को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने उस समय ‘हनुमान अंश’ का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। लेकिन कुछ समय बाद कहानी ने एक दिलचस्प मोड़ लिया। फिल्म में शोभिनव सत्य सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में काम कर रहे थे। इसी दौरान जब शोभिनव ने फिल्म में नीम करौली बाबा का किरदार निभाना शुरू किया, तब निर्देशन विभाग में उनकी जिम्मेदारियों को संभालने के लिए एक अनुभवी व्यक्ति की जरूरत पड़ी। यहीं से फिल्म की टीम को एक बार फिर शशांक की जरूरत महसूस हुई और उनसे दोबारा संपर्क किया गया।
टीम ने उनसे कहा कि वे जानते हैं कि शशांक आमतौर पर फर्स्ट एडी के रूप में काम करते हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में फिल्म को उनके अनुभव की जरूरत है। निर्देशक विशाल सर और टीम के साथ अपने जुड़ाव को देखते हुए शशांक ने इस बार प्रस्ताव स्वीकार किया और सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में ‘हनुमान अंश’ से जुड़ गए।

एक ‘ना’ से बना दिलचस्प संयोग
इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प संयोग भी छिपा है। अगर शशांक शुरुआत में ही ‘हनुमान अंश’ में फर्स्ट एडी के रूप में जुड़ जाते, तो संभव था कि वह अपनी एडी टीम के साथ फिल्म में आते। ऐसे में शोभिनव सत्य का सेकंड एडी के रूप में फिल्म से जुड़ना और बाद में नीम करौली बाबा का किरदार निभाना शायद उसी तरह संभव नहीं होता। यानी शशांक का शुरुआत में फिल्म को ‘ना’ कहना, शोभिनव का सेकंड एडी के रूप में जुड़ना, फिर उनका बाबा के किरदार में आना और अंततः शशांक का सेकंड एडी के रूप में उसी फिल्म में पहुंचना, इन घटनाओं ने ‘हनुमान अंश’ के पर्दे के पीछे अपनी एक अलग कहानी बना दी।

जिस ‘पहरेदार’ के लिए छोड़ा मौका, उसे किया पूरा
दिलचस्प बात यह भी है कि जिस ‘पहरेदार’ के कारण शशांक ने शुरुआत में ‘हनुमान अंश’ में फर्स्ट एडी बनने का प्रस्ताव छोड़ा था, उस फिल्म को उन्होंने बाद में लेखक और निर्देशक के रूप में पूरा किया। साइकोलॉजिकल क्राइम थ्रिलर ‘पहरेदार’ उनके स्वतंत्र फिल्म निर्माण के सफर का अगला महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है।

पत्नी पारुल अग्रवाल भी फिल्म निर्माण के सफर में साथ
शशांक की इस यात्रा में उनकी पत्नी पारुल अग्रवाल भी उनके साथ हैं। दोनों टाउनहॉल पिक्चर्स के सह-संस्थापक हैं और इसके माध्यम से फिल्म एवं अन्य रचनात्मक प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। इस तरह पारुल उनकी जीवनसाथी होने के साथ-साथ फिल्म निर्माण के सफर में उनकी सहयोगी भी हैं।

बलिया की जड़ों से मुंबई के फिल्म सेट तक
शशांक की कहानी में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि जिस परिवार की कई पीढ़ियों ने भारतीय सेना की वर्दी पहनकर देश की सेवा की, उसी परिवार के शशांक ने अपने लिए कैमरा, कहानी और निर्देशन की दुनिया चुनी। कैथवली की जड़ों, बहादुरपुर में बसे परिवार और होली क्रॉस स्कूल, बलिया से शुरू हुआ यह सफर आज मुंबई के फिल्म सेट तक पहुंच चुका है। एक ओर परिवार की कई पीढ़ियों की सैन्य विरासत है, तो दूसरी ओर शशांक का अपना फिल्मी सफर। ‘हनुमान अंश’ इस यात्रा का एक यादगार पड़ाव है, जबकि अपनी कहानियों को लिखना और निर्देशित करना उनके आगे के सफर की दिशा है।

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *