
शादी-विवाह से लेकर राजनीतिक आयोजनों तक पिता की परछाईं बनकर चलते रहे प्रिंस, अब पिता की विरासत और जनता की उम्मीदों की बड़ी जिम्मेदारी
रोशन जायसवाल,
बलिया। बसपा विधायक रहे स्वर्गीय उमाशंकर सिंह करीब ढाई वर्षों तक गंभीर बीमारी से जूझते रहे, लेकिन बीमारी को उन्होंने कभी अपने सार्वजनिक जीवन पर हावी नहीं होने दिया। स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बावजूद वह लगातार लोगों के बीच बने रहे। छोटे-बड़े सामाजिक आयोजन हों, शादी-विवाह का कार्यक्रम हो या फिर राजनीतिक गतिविधियां, उमाशंकर सिंह जहां भी जाते, उनके साथ अक्सर उनके पुत्र प्रिंस युकेश सिंह दिखाई देते थे।
पिता के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का यह सिलसिला महज पारिवारिक साथ नहीं था, बल्कि इसे उमाशंकर सिंह की राजनीतिक और सामाजिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की एक लंबी प्रक्रिया के रूप में भी देखा जा सकता है। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने वाले उमाशंकर सिंह ने अपने बेटे को भी लगातार लोगों के बीच रहना, कार्यकर्ताओं से संवाद करना और सामाजिक सरोकारों से जुड़ना सिखाया।

बीमारी से लड़ते हुए भी जनता से दूरी नहीं बनाई
करीब ढाई वर्ष तक बीमारी से संघर्ष के दौरान उमाशंकर सिंह की दिनचर्या आसान नहीं रही। इसके बावजूद उन्होंने जनता और कार्यकर्ताओं से अपने रिश्ते कमजोर नहीं होने दिए। उनकी राजनीति का आधार केवल चुनावी गतिविधियां नहीं थीं, बल्कि लोगों के सुख-दुख में खड़ा होना भी उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा।
इसी दौरान प्रिंस युकेश सिंह लगातार उनके साथ रहे। पिता के साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में पहुंचने से लेकर लोगों से मुलाकात तक, प्रिंस को उमाशंकर सिंह के साथ लगातार देखा गया। धीरे-धीरे यह साथ राजनीतिक प्रशिक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी की एक अनकही पाठशाला भी बनता गया।

27 मार्च को गांव लौटे थे उमाशंकर सिंह
उमाशंकर सिंह 27 मार्च को करीब चार महीने दस दिन बाद अपने गांव खनवर स्थित घर पहुंचे थे। होली के बाद जब लोग उनसे मिलने के लिए घर पहुंचे तो उन्होंने उसी आत्मीयता के साथ लोगों का स्वागत किया। लोगों को अपने हाथ से गुजिया खिलाने की वह तस्वीर आज परिवार और करीबियों के लिए भावुक कर देने वाली स्मृति बन चुकी है।
उस समय भी उनके पुत्र प्रिंस युकेश सिंह अपने पिता के साथ मौजूद थे। पिता लोगों से मिल रहे थे और प्रिंस उनके साथ हर छोटी-बड़ी जरूरत में खड़े दिखाई दे रहे थे। किसी को शायद अंदाजा नहीं था कि 27 मार्च को घर लौटना उमाशंकर सिंह की अंतिम यात्रा से पहले अपने गांव की अंतिम वापसी साबित होगी।
अब बेटे के सामने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने की चुनौती
उमाशंकर सिंह के निधन के बाद सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में से एक उनके पुत्र प्रिंस युकेश सिंह के कंधों पर आ गई है। यह जिम्मेदारी केवल परिवार की नहीं, बल्कि उस सामाजिक और राजनीतिक रिश्ते की भी है जिसे उमाशंकर सिंह ने वर्षों की मेहनत से बनाया था।
उमाशंकर सिंह की राजनीति में जनता से सीधा जुड़ाव, कार्यकर्ताओं के साथ आत्मीय संबंध और सामाजिक आयोजनों में सक्रिय भागीदारी प्रमुख रही। ऐसे में प्रिंस के सामने चुनौती भी बड़ी है और अवसर भी। उन्हें पिता की बनाई पहचान को केवल राजनीतिक विरासत के रूप में नहीं, बल्कि जनता के साथ रिश्ते और सेवा की परंपरा के रूप में आगे बढ़ाना होगा।
उमाशंकर सिंह की जिंदगी छोड़ गई एक राजनीतिक सीख
उमाशंकर सिंह की अंतिम यात्रा के बाद उनकी राजनीतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण संदेश भी सामने आता है, राजनीति केवल पद और चुनाव तक सीमित नहीं होती। जनता के बीच लगातार मौजूद रहना, सुख-दुख में साथ खड़ा होना और अपने व्यवहार से लोगों के दिल में जगह बनाना ही किसी जनप्रतिनिधि की असली पूंजी होती है। गंभीर बीमारी से जूझते हुए भी उमाशंकर सिंह का चलते रहना, लोगों से मिलना और सार्वजनिक जीवन से जुड़े रहना उनकी मेहनत और जुझारूपन को दर्शाता है। उन्होंने अपने बेटे को भी इसी वातावरण में आगे बढ़ाया। अब समय की दिशा बदल चुकी है। पिता की छाया साथ नहीं है, लेकिन उनके साथ बिताए वर्षों की सीख, जनता से जुड़ाव और सामाजिक जिम्मेदारी का अनुभव प्रिंस युकेश सिंह के सामने है।

