रोशन जायसवाल,
बलिया। उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण और सामाजिक प्रतिनिधित्व हमेशा से चुनावी रणनीति के अहम हिस्से रहे हैं। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा भी अलग-अलग सामाजिक वर्गों के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। इस रणनीति में पिछड़े वर्गों के बड़े नेताओं और मुस्लिम समाज से आने वाले चेहरों की भूमिका पर खास नजर है।
दारा सिंह चौहान: सपा से भाजपा तक का सफर और सत्ता में मजबूत भूमिका
दारा सिंह चौहान का राजनीतिक सफर उत्तर प्रदेश की बदलती सियासत का एक अहम उदाहरण है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में वह समाजवादी पार्टी के टिकट पर घोसी विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधायक बने। बाद में उन्होंने सपा छोड़कर भाजपा का दामन थामा और भाजपा ने उन्हें घोसी उपचुनाव में अपना प्रत्याशी बनाया। हालांकि, इस उपचुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
इसके बावजूद भाजपा नेतृत्व ने दारा सिंह चौहान को राजनीतिक महत्व दिया। उन्हें विधान परिषद सदस्य बनाया गया और योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। वर्तमान में वह कारागार मंत्री हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में दारा सिंह चौहान की अहमियत सिर्फ एक मंत्री तक सीमित नहीं है। चौहान समाज और अन्य पिछड़े वर्गों के बीच उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता भाजपा के लिए कितनी उपयोगी साबित होती है, यह 2027 के चुनाव में महत्वपूर्ण सवाल होगा।
दानिश आजाद अंसारी: भाजपा का मुस्लिम चेहरा
दूसरी ओर, बलिया जिले से आने वाले दानिश आजाद अंसारी भाजपा की राजनीति में मुस्लिम समाज के एक प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे हैं। योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री के रूप में उनकी मौजूदगी को भाजपा की सामाजिक प्रतिनिधित्व की रणनीति से जोड़कर देखा जाता है।
भाजपा के सामने चुनौती यह है कि दानिश आजाद अंसारी की राजनीतिक और सामाजिक पहुंच मुस्लिम समाज के बीच कितनी प्रभावी साबित होती है। क्या उनकी मौजूदगी मुस्लिम मतदाताओं के एक हिस्से को भाजपा के करीब लाने में मदद करेगी, या मुस्लिम वोटों का पारंपरिक रुझान पहले की तरह बना रहेगा? इसका जवाब चुनाव के नतीजों में ही मिलेगा।
2027 में क्या साबित कर पाएंगे दोनों नेता?
उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर होने वाले अगले चुनाव में भाजपा के सामने सत्ता बरकरार रखने की चुनौती होगी। ऐसे में दारा सिंह चौहान और दानिश आजाद अंसारी जैसे नेताओं की भूमिका पर राजनीतिक गलियारों में चर्चा स्वाभाविक है। एक ओर चौहान समाज और अन्य पिछड़े वर्गों के बीच भाजपा की पकड़ मजबूत करने की उम्मीद है, तो दूसरी ओर दानिश आजाद अंसारी के जरिए मुस्लिम समाज के बीच राजनीतिक संवाद और स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश को देखा जा रहा है। फिलहाल निगाहें 2027 पर टिकी हैं। दारा सिंह चौहान अपने समाज में भाजपा की कितनी राजनीतिक ताकत बढ़ा पाएंगे और दानिश आजाद अंसारी मुस्लिम मतदाताओं के बीच कितनी स्वीकार्यता हासिल करेंगे, यह आने वाला विधानसभा चुनाव तय करेगा।
