बलिया। नवरात्रि में नवमी का हवन तथा कुमारी पूजन का विशेष महत्व है। कुमारी पूजन शक्ति साधना का एक अनिवार्य अंग है। अतः इस अनुष्ठान में कुमारियों का षोडशोपचार पूजन शक्ति के रूप में किया जाता है। इसके बिना व्रत का संकल्प पूर्ण नहीं माना जाता है। अतः जो भक्त कुमारी कन्याओं को अन्न ,वस्त्र व जल अर्पण करता है, उसका अन्न मेरु के समान और जल समुद्र के सदृश अक्षुण्ण तथा अनन्त होता है। कुमारी कन्याओं को वस्त्र अर्पित करने से भक्तगण करोड़ो वर्षों तक शिवलोक में पूजे जाते है तथा पूजा के उपकरण दान देने पर स्वयं देवगण पुत्र के रूप में प्राप्त होते है।
मां दुर्गा की पूजा अनेक विधानों से की जाती है। सर्वविद्या स्वरूपिणी में कुमारी कन्याओं के पूजन में जाति भेद का विचार वर्जित है। जहां कन्याओं का पूजन होता है वह स्थान चार से पांच कोस तक पवित्र हो जाता है। कुमारी पूजन से मनुष्य, लक्ष्मी, धन, पृथ्वी, श्री, सरस्वती व महान तेज को प्राप्त करता है। पूजित हुई कन्या विघ्न भय और अत्यन्त उत्कट शत्रुओं को भी नष्ट कर देती है तथा भक्तों के ग्रह, रोग, भूत तथा सर्प से होने वाले भय मिट जाते है। कुमारी कन्या को पाद्य, अर्घ, धूप, कुमकुम, चन्दन आदि को अर्पण कर भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये।
जितने उम्र की कन्या, वैसा ही अद्भुत फल
ज्योतिषाचार्य डॉ. अखिलेश कुमार उपाध्याय ने बताया कि मंत्रमहोदधि ग्रन्थ’ के अनुसार दो वर्ष की आयु से लेकर दस वर्ष तक की कन्याओं का पूजन करना चाहिए। 2 वर्ष की कन्या की पूजा करने से धन-ऐश्वर्य मिलता है। 3 वर्ष की कन्या की पूजा करने पर धन-धान्य की प्राप्ति होगी। 4 वर्ष की कन्या की पूजा करने से परिवार का कल्याण होता है। 5 साल की कन्या की पूजा करने पर रोगों से मुक्ति मिलती है। 6 साल की कन्या की पूजा से विद्या, विजय और राजयोग मिलता है। सात साल की कन्या की पूजा से ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी। 8 साल की कन्या पूजा से व्यक्ति को कोर्ट केस में सफलता मिलेगी। 9 साल की कन्या की पूजा करने से शत्रुओं पर विजय मिलती है। 10 साल की कन्या पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कन्या पूजा में बालिकाओं के साथ एक बालक को बैठना जरूरी होता है. उस बालक को बटुक भैरव का प्रतीक माना जाता है. बटुक भैरव को भैरव नाथ का सौम्य स्वरूप माना जाता है।
