बलिया में पुलिस कप्तान के तौर पर दो ऐसे आईपीएस अधिकारियों को मैंने करीब से देखा, जिनकी कार्यशैली आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी रही। दोनों अधिकारियों की खास बात यह थी कि वे सिर्फ कार्यालय में बैठकर व्यवस्था को नहीं देखते थे, बल्कि जनता के बीच जाकर उनकी समस्याएं सुनने और मौके पर समाधान की कोशिश करते नजर आते थे।
मैं, रोशन जायसवाल, उस दौर में उनके विभिन्न कार्यक्रमों और गतिविधियों की पत्रकार के रूप में लगातार कवरेज करता था।
आईपीएस प्रभाकर चौधरी वर्ष 2016 में बलिया के पुलिस अधीक्षक बने। उनका कार्यकाल भले ही बहुत छोटा रहा, लेकिन उनकी सक्रिय कार्यशैली और जनता से सीधे संवाद ने उन्हें बलिया में खास पहचान दिलाई। उनके तबादले के बाद भी लोगों की प्रतिक्रिया सामने आई और उनके समर्थन में विरोध-प्रदर्शन तक हुआ।

इसी तरह आईपीएस अनीस अहमद भी बलिया में अपनी कार्यशैली को लेकर चर्चा में रहे। जनता से संवाद, मौके पर पहुंचकर समस्याओं को समझना और पुलिस व्यवस्था को लेकर सक्रिय रहना उनकी पहचान का हिस्सा रहा। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि पुलिस कप्तान की कुर्सी पर बैठकर जनता के बीच पहुंचने वाले अधिकारी लोगों की यादों में लंबे समय तक बने रहते हैं। इन दोनों अधिकारियों के कार्यकाल की कई तस्वीरें और कार्यक्रम आज भी मेरी पत्रकारिता की यादों का हिस्सा हैं।
