मालवीय जी के विचारों से प्रभावित होकर ग्रामीण अंचल में शिक्षा की अलख जगाई, कई शिक्षण संस्थानों की स्थापना में निभाई अहम भूमिका
बलिया। पूर्वांचल की धरती ने अनेक ऐसे व्यक्तित्वों को जन्म दिया, जिन्होंने अपने त्याग, समर्पण और दूरदृष्टि से समाज को नई दिशा दी। बाबू शिवशंकर सिंह ‘वकील साहब’ भी ऐसे ही व्यक्तित्व थे। वे प्रखर अधिवक्ता होने के साथ सामाजिक समरसता के अग्रदूत और ग्रामीण अंचल में शिक्षा की अलख जगाने वाले शिक्षाविद् के रूप में याद किए जाते हैं।
उक्त बातें डॉ. मनजीत सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर हिंदी, कुंवर सिंह स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बलिया ने शनिवार को वकील साहब के जयंती अवसर पर कही। उन्होंने कहा कि 12 सितंबर 1919 को मऊ जनपद के रतनपुरा विकासखंड स्थित हलधरपुर गांव में जन्मे बाबू शिवशंकर सिंह का जीवन देशप्रेम, धर्मपरायणता और सामाजिक सरोकारों से जुड़ा रहा। पिता यमुना प्रसाद सिंह और माता यशोधरा देवी के संस्कारों में पले-बढ़े वकील साहब बचपन से ही छुआछूत और सामाजिक विषमता के विरोधी रहे। समाज के सभी वर्गों के प्रति समरसता और मानवीय दृष्टिकोण उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषता थी। ‘हरिशरणम्’ उनका जीवन मंत्र रहा।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान उनकी कुशाग्र बुद्धि, तर्कशक्ति और प्रभावशाली वाक्पटुता ने सभी को प्रभावित किया। इसी दौरान उन्हें महामना पंडित मदन मोहन मालवीय का सानिध्य मिला। वर्ष 1941 से 1946 के बीच वे मालवीय जी के सहचर के रूप में प्रयाग और काशी में आयोजित विभिन्न राष्ट्रीय, सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहे। मालवीय जी के विचारों का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
