Ballia : एक नाम, एक कलंक और 75 साल का इंतज़ार : क्यों आज भी ‘रूपवार तवायफ’ गांव के लोग बदलवाना चाहते हैं अपनी पहचान

बलिया। कभी-कभी किसी इंसान या समाज की सबसे बड़ी पीड़ा गरीबी या बीमारी नहीं होती, बल्कि एक ऐसा नाम होता है जो पहचान नहीं, बल्कि बोझ बन जाता है। उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारी इतिहास से जुड़े बलिया ज़िले में ऐसा ही एक गांव है रूपवार तवायफ, जो आज़ादी के 75 साल बाद भी अंग्रेज़ी हुकूमत द्वारा दिए गए नाम का दर्द झेल रहा है।
बलिया मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर पंदह ब्लॉक में बसे इस गांव में लगभग 800 मतदाता हैं। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि अंग्रेज़ों के शासनकाल में यह इलाका उनके ऐश-ओ-आराम का ठिकाना हुआ करता था। उस दौर में करीब 400 तवायफों को यहां ज़मीन देकर बसाया गया और शाम ढलते ही अंग्रेज़ अफसरों की महफ़िलें सजा करती थीं। अंग्रेज़ तो देश छोड़कर चले गए, लेकिन गांव को दिया गया यह नाम आज भी यहां के लोगों के लिए सामाजिक कलंक बना हुआ है।
इस नाम का सबसे गहरा असर गांव की महिलाओं पर पड़ता है। गांव की कई महिलाएं शहरों में नौकरी करती हैं, लेकिन होटल में कमरा लेना हो या किसी दफ्तर में पहचान पत्र दिखाना पड़े, तो आईडी कार्ड पर लिखा गांव का नाम लोगों की नजर बदल देता है। महिलाओं का कहना है कि उन्हें शक और तिरस्कार की नजर से देखा जाता है, जैसे उन्होंने कोई अपराध किया हो।
शहरों में अपने गांव का नाम छिपा रही युवा पीढ़ी
यही कारण है कि गांव की युवा पीढ़ी शहरों में जाकर अपने गांव का नाम और पता तक छुपाने को मजबूर है, ताकि इस नाम से जुड़ी बदनामी से बच सके। गांव वालों का कहना है कि प्रदेश और देश में कई शहरों और जिलों के नाम सरकार एक आदेश से बदल देती है, लेकिन उनके गांव की मांग सालों से फाइलों में दबी हुई है।
रिश्तों में बन रही सबसे बड़ी रूकावट
गांव के पूर्व प्रधान बताते हैं कि यह नाम सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि रिश्तों में भी सबसे बड़ी रुकावट बन चुका है। शादी से पहले ही लोग गांव का नाम सुनकर पीछे हट जाते हैं। कई बार खुले तौर पर यह कह दिया जाता है “कहीं उस सोच का असर तो नहीं?” यह सवाल गांव की बेटियों के लिए सबसे बड़ा अपमान बन जाता है।
ग्रामीणों का है कहना, यह नाम छीन रहा सम्मान
ग्रामीणों का साफ कहना है कि उनकी लड़ाई किसी सरकार या व्यवस्था से नहीं, बल्कि उस नाम से है जो उनके सम्मान को छीन रहा है। सरकार से बस एक ही मांग है गांव का नाम बदला जाए, ताकि वे भी सम्मान के साथ सामान्य जीवन जी सकें।
यह कहानी सिर्फ रूपवार तवायफ गांव की नहीं है, बल्कि उस पीड़ा की है, जिसे एक नाम के कारण पीढ़ियों से झेला जा रहा है। सवाल सिर्फ इतना है क्या आज़ाद भारत में किसी गांव को अपनी पहचान बदलने का हक नहीं? और क्या सरकार उन लोगों को वह सम्मान लौटाएगी, जिसका इंतज़ार वे दशकों से कर रहे हैं?
मयूरी सिंह की एक रिपोर्ट,

