29 अक्टूबर को दुर्लभ महायोगों के दिव्य संयोग में संपन्न होगा करवाचौथ
बलिया। भारतीय सनातन संस्कृति में करवा चौथ केवल एक पारंपरिक उपवास नहीं, बल्कि त्याग, निष्ठा और दांपत्य के शाश्वत अनुराग का जीवंत उत्सव है। इस वर्ष यह महापर्व 29 अक्टूबर को दुर्लभ महायोगों के दिव्य संयोग में संपन्न होगा। सुहागिन महिलाएं ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सरगी ग्रहण करेंगी और सुबह के साथ ही पति की दीर्घायु, आरोग्य एवं अखंड सौभाग्य की कामना लेकर निर्जला व्रत का संकल्प लेंगी। आकाश मंडल में इस दिन रोहिणी नक्षत्र के साथ वरीयान, परिघ, बुधादित्य, मालव्य, सरस्वती और अखंड सौभाग्य जैसे महायोगों का निर्माण हो रहा है, जो व्रती के आध्यात्मिक संकल्प को अलौकिक सिद्धि प्रदान करेंगे।
इस संबंध में ज्योतिषाचार्य डॉ. अखिलेश कुमार उपाध्याय ने बताया कि शास्त्रों की मान्यता है कि भद्रा का प्रभाव व्रत के आरंभ होने से पहले ही सुबह 4ः27 बजे समाप्त हो चुका होगा, जिससे पूरा दिन दोषमुक्त और पावन रहेगा। शाम ढलते ही महिलाएं सोलह श्रृंगार कर पारंपरिक परिधानों में सुसज्जित होकर पूजन वेदी की स्थापना करेंगी। मिट्टी की वेदी अथवा लकड़ी के पाटे पर पीली मिट्टी से गौरी-गणेश तथा संपूर्ण शिव परिवार को प्रतिष्ठित किया जाएगा। पूजन की थाली में मिट्टी का टोंटीदार करवा, रोली, अक्षत, सिंदूर, चंदन, पुष्प, दीप, नैवेद्य और पंचामृत का विधान रहेगा। करवा चौथ की प्राचीन कथा का श्रवण करते समय हाथ में गेहूं के दाने रखना शुभ माना जाता है, जिससे चित्त एकाग्र और संकल्प दृढ़ रहेगा। कथा के उपरांत मां पार्वती को आठ पूड़ियों और हलवे का नैवेद्य अर्पित किया जाएगा।
रात्रि 7ः57 बजे जैसे ही गगन में अमृतमयी चंद्रदेव का प्राकट्य होगा, उत्सव अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचेगा। सुहागिनें छलनी के माध्यम से सर्वप्रथम चंद्रदेव को अर्घ्य देकर उनके शीतल तेज को नमन करेंगी। इसके पश्चात उसी छलनी की ओट से जीवनसाथी के मुख का दर्शन कर उनके कर-कमलों से जल ग्रहण करेंगी और निर्जला व्रत का पारण करेंगी और चन्द्रदेव से अमरत्व और सौम्यता का वरदान मांगकर अंत में परिवार के वयोवृद्ध जनों के चरण स्पर्श कर अखंड सौभाग्य का आशीष लेंगी क्योंकि बड़ों का आशीर्वाद ही गृहस्थ जीवन की वास्तविक शक्ति और संबल प्रदान करेगा।
