
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कानून-व्यवस्था हमेशा बड़ा मुद्दा रही है। योगी आदित्यनाथ सरकार के कार्यकाल में माफियाओं और संगठित अपराध के खिलाफ हुई कार्रवाई को सरकार अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती है। अपराधियों पर बुलडोजर और संपत्तियों पर कार्रवाई ने प्रदेश की राजनीति में एक अलग संदेश दिया। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। सवाल यह है कि जिस सख्ती से माफियाओं पर कार्रवाई हुई, क्या उसी सख्ती से भ्रष्टाचार पर भी शिकंजा कसा गया?
सरकारी दफ्तरों से लेकर विकास कार्यों तक भ्रष्टाचार की शिकायतें आज भी सामने आती हैं। आम आदमी का सवाल यही है कि अगर सरकार अपराध और माफिया के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपना सकती है, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ भी वैसी ही सख्ती क्यों नहीं दिखाई देती?
बसपा शासन में मायावती की कानून-व्यवस्था को लेकर भी आज राजनीतिक चर्चाएं होती हैं। उस दौर की सख्त प्रशासनिक छवि को आज के दौर से जोड़कर देखने वाले लोग भी हैं। मुद्दा किसी एक सरकार की तारीफ या आलोचना का नहीं, बल्कि सवाल कानून के राज का है। माफिया का डर खत्म होना जरूरी है, लेकिन भ्रष्टाचार का डर खत्म होना भी उतना ही जरूरी है। जनता को ऐसा शासन चाहिए, जहां अपराधी कानून से डरे और भ्रष्ट अधिकारी जनता से नहीं, कानून से डरें।

