
रोशन जायसवाल,
बलिया। सियासत में कोई भी कदम बिना किसी ठोस कारण के नहीं उठाया जाता और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां 2027 के विधानसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं हैं। योगी सरकार का यह मंत्रिमंडल विस्तार पूरी तरह से चुनावी मोड की तैयारी का संकेत है। इस विस्तार के पीछे भाजपा की गहरी सोच और रणनीति के कुछ मुख्य बिंदु बताये जा रहे है। पहला जातिगत और क्षेत्रीय संतुलन है। भाजपा ने इस विस्तार के जरिए सोशल इंजीनियरिंग का वही पुराना लेकिन कारगर फॉर्मूला अपनाया है।
दलित और ओबीसी पर फोकस
कृष्णा पासवान (पासी समुदाय) और सुरेंद्र दिलेर (वाल्मीकि समुदाय) को शामिल करना दलित वोटों को साधने की कोशिश है। वहीं, हंसराज विश्वकर्मा (ओबीसी) के जरिए पिछड़े वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने का संदेश दिया गया है।
ब्राह्मण चेहरा में सपा से बगावत कर भाजपा में शामिल मनोज पांडे को मंत्री बनाकर भाजपा ने रायबरेली और आसपास के इलाकों में ब्राह्मणों को एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।
सपा के पीडीए फॉर्मूले की काट
अखिलेश यादव का पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नारा पिछले कुछ समय से चर्चा में है। भाजपा ने अपने नए मंत्रियों के चयन में पिछड़े और दलित चेहरों को प्रमुखता देकर यह दिखाने की कोशिश की है कि वह सभी वर्गों को सत्ता में हिस्सेदारी दे रही है।
आते ही मिला मंत्रिमंडल
मनोज पांडे जैसे नेताओं को जगह देकर भाजपा ने यह साफ कर दिया है कि जो दूसरे दलों से आएंगे और जनाधार लाएंगे, उन्हें सम्मान मिलेगा।
भूपेंद्र चौधरी (पूर्व प्रदेश अध्यक्ष) की कैबिनेट में वापसी से जाट समुदाय और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी की पकड़ को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।
असंतोष कम करना और नई ऊर्जा
चुनाव से ठीक एक साल पहले मंत्रिमंडल विस्तार करने से कार्यकर्ताओं और विधायकों में एक नई ऊर्जा आती है। जिन्हें जिम्मेदारी मिली है, वे अब पूरी ताकत से अपने क्षेत्रों में 2027 के लिए जुट जाएंगे।
2024 लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद भाजपा के सामने रहीं चुनौती
भाजपा का थिंक टैंक जानता है कि 2024 के लोकसभा परिणामों के बाद यूपी में चुनौतियां बढ़ी हैं। इसलिए, यह विस्तार केवल रिक्त पद भरने के लिए नहीं, बल्कि क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने और विपक्ष के आक्रामक जातिगत प्रचार को कुंद करने की सोच मानी जा सकती है।

