
18 करोड़ रुपये की परियोजना को मिली गति, सुरहाताल से गंगा तक ऐतिहासिक धरोहर को संवारने की कवायद तेज
बलिया। ऐतिहासिक कटहल नाला के विकास और सुंदरीकरण की 18 करोड़ रुपये की परियोजना ने अब रफ्तार पकड़ ली है। लंबे समय से प्रस्तावित इस महत्वपूर्ण परियोजना को गति देने के लिए परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह के स्तर से लगातार पहल की जा रही है। मंत्री के एक्शन के बाद संबंधित विभागों और कार्यदायी संस्थाओं में भी सक्रियता बढ़ी है।

परियोजना के तहत सुरहाताल से गंगा नदी तक कटहल नाला के विकास, सुंदरीकरण और संरक्षण की योजना है। इसके पूरा होने के बाद न केवल जलनिकासी व्यवस्था को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी, बल्कि ऐतिहासिक कटहल नाला को पर्यटन और आकर्षण के केंद्र के रूप में भी विकसित किया जा सकेगा।
अधिकारियों के अनुसार, परियोजना से जुड़े कार्यों में तेजी लाने के लिए आवश्यक प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के साथ ही आसपास के क्षेत्र के विकास पर भी जोर दिया जा रहा है। परियोजना के पूरा होने पर कटहल नाला की तस्वीर बदलने की उम्मीद है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कटहल नाला बलिया की ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा हुआ है। लंबे समय से इसके विकास और सुंदरीकरण की मांग उठती रही है। अब परियोजना में तेजी आने से लोगों में उम्मीद जगी है कि जल्द ही यह क्षेत्र नए स्वरूप में नजर आएगा।
सुरहाताल और कटहल नाला… बलिया की सदियों पुरानी प्राकृतिक धरोहर
बलिया। बलिया की पहचान केवल ऐतिहासिक और स्वतंत्रता संग्राम की धरती के रूप में ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध भौगोलिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी है। जिले की सबसे बड़ी प्राकृतिक झील सुरहाताल और इसे गंगा से जोड़ने वाला कटहल नाला सदियों से बलिया की प्राकृतिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। कभी यही जल तंत्र बाढ़ के पानी को नियंत्रित करने के साथ ही खेती, भूजल संरक्षण और मत्स्य पालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।
सुरहाताल करीब 24.9 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली जिले की सबसे बड़ी प्राकृतिक झील मानी जाती है। यह सदियों से गंगा के बाढ़ क्षेत्र का हिस्सा रही है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इसका नाम पहले ‘सुरथ ताल’ था, जो समय के साथ बदलकर सुरहाताल हो गया। कुछ लोककथाओं में इसका संबंध चेरो शासकों से भी जोड़ा जाता है, हालांकि इसके कृत्रिम निर्माण के स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते।
वर्ष 1991 में सुरहाताल को पक्षी विहार घोषित किया गया। बाद में इसका नाम जयप्रकाश नारायण पक्षी विहार रखा गया। आज यह हजारों प्रवासी पक्षियों के लिए प्रमुख आश्रय स्थल है। सर्दियों के मौसम में यहां देश-विदेश से आने वाले पक्षियों की मौजूदगी क्षेत्र की जैव विविधता को और समृद्ध करती है।
गंगा और सुरहाताल के बीच प्राकृतिक कड़ी था कटहल नाला
सुरहाताल को गंगा से जोड़ने वाला करीब 23 किलोमीटर लंबा कटहल नाला कभी प्राकृतिक जलप्रवाह का महत्वपूर्ण माध्यम था। गंगा में बाढ़ आने पर पानी इसी नाले के रास्ते सुरहाताल में पहुंचता था। वहीं, बाढ़ का पानी उतरने के बाद झील का अतिरिक्त पानी वापस गंगा में चला जाता था। इस प्राकृतिक व्यवस्था से बाढ़ नियंत्रण के साथ-साथ भूजल स्तर, सिंचाई और मत्स्य उत्पादन को भी लाभ मिलता था।
अतिक्रमण और गाद से बाधित हुआ प्राकृतिक प्रवाह
समय के साथ कटहल नाले पर बने चाभी फाटक, अतिक्रमण और गाद जमा होने से इसका प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हुआ। इसका सीधा असर सुरहाताल की पारिस्थितिकी और जल निकासी व्यवस्था पर पड़ा। कभी गंगा और सुरहाताल के बीच प्राकृतिक जल संतुलन बनाए रखने वाला यह नाला अब अपने पुराने स्वरूप को बचाने के लिए संरक्षण और पुनर्जीवन की जरूरत महसूस कर रहा है।
सुरहाताल और कटहल नाला केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि बलिया की प्राकृतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विरासत का हिस्सा हैं। सदियों से इन दोनों ने क्षेत्र की खेती, मछली पालन, जल संरक्षण और जैव विविधता को समृद्ध किया है। इनके संरक्षण और पुनर्जीवन से न केवल पर्यावरण को लाभ मिलेगा, बल्कि बलिया की ऐतिहासिक प्राकृतिक पहचान भी मजबूत होगी।

