
एनडीए में सीटों पर बात नहीं बनी तो क्या पुराने रिश्ते की ओर लौटेंगे राजभर?
रोशन जायसवाल,
लखनऊ/बलिया। पूर्वांचल की राजनीति में अपनी अलग पहचान रखने वाले सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर एक बार फिर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी चर्चा के केंद्र में हैं। ओपी राजभर ने लंबे समय तक बसपा की राजनीति में सक्रिय रहने के बाद वर्ष 2002 में अपनी अलग पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) का गठन किया था।
राजभर की राजनीति को देखें तो गठबंधन बदलना उनके सियासी सफर का अहम हिस्सा रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के खिलाफ समाजवादी पार्टी का साथ दिया। सुभासपा ने सपा गठबंधन के साथ चुनाव लड़ा और 17 सीटों पर लड़कर छह सीटें जीतीं। इसके बाद 2023 में ओपी राजभर फिर भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए में लौट आए। अब नजर 2027 के विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे पर है। पूर्वांचल की कई विधानसभा सीटों पर सुभासपा अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटी है। मीडिया रिपोर्टों में सुभासपा की ओर से कई सीटों पर दावे की चर्चा भी सामने आई है।
सियासी गलियारों में चर्चाओं में है ये सवाल
सियासी गलियारों में सवाल यह है कि अगर एनडीए में सीट शेयरिंग को लेकर ओपी राजभर की उम्मीद के मुताबिक समझौता नहीं हुआ तो क्या वे कोई नया सियासी विकल्प तलाश सकते हैं? क्या ऐसी स्थिति में बसपा के साथ भी संभावित गठजोड़ की गुंजाइश बन सकती है? अभी यह केवल राजनीतिक चर्चा और संभावना है, इसकी कोई पुष्टि नहीं है।
लेकिन ओपी राजभर का पिछला सियासी सफर बताता है कि उत्तर प्रदेश की गठबंधन राजनीति में परिस्थितियों के अनुसार समीकरण बदलते रहे हैं। 2027 के चुनाव को लेकर राजभर पूर्वांचल की कई सीटों पर संगठन और जनसंपर्क को मजबूत करने में जुटे हैं। उनकी कोशिश साफ दिखाई देती हैकृजिन सीटों पर सुभासपा मजबूत स्थिति में है, वहां एनडीए के भीतर अपनी हिस्सेदारी और दावेदारी मजबूत कराना।

