
वह दिन दूर नहीं, जब बलिया शहर के रिंग बांध से सटकर गंगा की धारा अपना रास्ता तय करती नजर आएगी
रोेशन जायसवाल,
बलिया। जनपद बलिया का इतिहास गंगा की बदलती धारा और उसके कटान की कहानी से जुड़ा रहा है। पुराने लोगों के अनुसार महावीर घाट के आसपास कभी बलिया की बसावट रही। भृगु आश्रम मौजा और उसके बाद ताजपुर मौजा भी गंगा की बदलती धारा और कटान के इतिहास के गवाह रहे हैं।
आज हालात फिर उसी दिशा में बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। वर्तमान में गंगा भृगु आश्रम मौजा के आसपास बह रही है और अब धीरे-धीरे ताजपुर मौजा की तरफ कटान करती बढ़ रही है। लगातार हो रहे कटान ने स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर नदी की धारा इसी तरह शहर की तरफ बढ़ती रही तो क्या आने वाले वर्षों में गंगा रिंग बांध के बिल्कुल करीब पहुंच जाएगी। यह सिर्फ खेत और जमीन बचाने का सवाल नहीं है, बल्कि बलिया शहर की सुरक्षा का सवाल है।
हाल के वर्षों में बलिया के अलग-अलग हिस्सों में गंगा कटान ने गंभीर खतरे पैदा किए हैं।
जून 2026 में कोटवा नारायणपुर क्षेत्र में कटान के कारण गांव, ऐतिहासिक स्थल और एनएच-31 तक पर खतरे की आशंका जताई गई थी। वहीं अगस्त 2026 की एक रिपोर्ट में पिछले पांच दशकों में गायघाट से दूबेछपरा तक करीब 12 किलोमीटर क्षेत्र में 71 गांवों के नदी में समा जाने का उल्लेख है। ऐसे में शहर की तरफ बढ़ती गंगा को केवल आज की समस्या मानकर नजरअंदाज करना बड़ी भूल हो सकती है।
ठोकर और मजबूत तटबंध की जरूरत
जरूरत है कि कटान वाले स्थानों का तत्काल तकनीकी सर्वे कराया जाए और जहां आवश्यक हो वहां मजबूत बोल्डर ठोकर, जियो बैग तथा अन्य वैज्ञानिक कटानरोधी उपाय किए जाएं। केवल कटान होने के बाद राहत कार्य करने के बजाय नदी की धारा को समझकर पहले से सुरक्षा की रणनीति तैयार करनी होगी। क्योंकि सवाल सिर्फ आज की कुछ बीघे जमीन का नहीं है। अगर आज गंगा को रोकने की ठोस व्यवस्था नहीं हुई तो कल नदी शहर के दरवाजे तक पहुंच सकती है।
ग्रीन फील्ड एक्सप्रेसवे पर भी मंडरा सकता है खतरा
यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बलिया के आसपास बड़ी विकास परियोजनाएं आकार ले रही हैं। यदि अगले दो-तीन वर्षों तक कटान इसी दिशा में जारी रहा और नदी की धारा ने अपना रुख और बदला, तो भविष्य में ग्रीन फील्ड एक्सप्रेसवे के आसपास के हिस्से भी खतरे की जद में आ सकते हैं। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि गंगा निश्चित रूप से एक्सप्रेसवे तक पहुंचेगी, लेकिन कटान की मौजूदा दिशा को देखते हुए संभावित खतरे का वैज्ञानिक आकलन समय रहते होना चाहिए।

