Asarfi

रिक्शाचालक का बेटा कैसे बना आईएएस, जाने दर्दभरी कहानी

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रोशन जायसवाल,
उप्र के वाराणसी जिले के एक रिक्शाचालक का बेटा 22 साल की उम्र में यूपीएससी परीक्षा पास कर आईएएस बना। 2007 बैच के आईएएस अधिकारी गोविन्द जायसवाल के पिता एक रिक्शाचालक थे। वह जिस दौर से गुजरे, उसको वह कभी भुल नहीं सकते। एक समय वह भी था कि जब एक आईएएस के पिता की थाली में खाने के लिए ना तो रोटी था, ना दाल और ना सब्जी। चावल-आचार खाकर जीवन जीने वाला रिक्शाचालक का बेटा जब आईएएस बनकर लौटा तो उसके पिता की आंखों से आंसू नहीं रूक रहे थे। यह दर्दभरी कहानी आज की नहीं, बल्कि पिछले साल की है। गोविंद जायसवाल आईएएस बनकर उसी रिक्शा पर बैठकर घर गये, जो रिक्शा उनके पिता चलाते थे। आईये सुनते है वह कहानी….
काशी की गलियों में हर सुबह एक रिक्शा निकलता था वह रिक्शा नहीं, मानो एक पिता की उम्मीदें निकलती थीं। पसीने से भीगा बदन, थके हुए हाथ, और आंखों में एक ही सपना मेरा बेटा वो जिंदगी जिए, जो मैं कभी नहीं जी पाया। उस रिक्शे पर बैठकर पिता दिन भर सवारी ढोते थे और घर लौटकर पैसे गिनते थे, वह भी कम पड़ जाते थे। सोचते थे कि आज रोटी बनेगी या नहीं। घर छोटा था। अक्सर खाने में चावल, पानी और आचार कई रातें ऐसे बीतीं जब पेट तो भर गया, पर दिल खाली रह गया। लोग कहते थे
रिक्शावाले का बेटा है, आगे चलकर यह भी रिक्शा चलाएगा। ये शब्द सिर्फ ताना नहीं थे, ये हर दिन उसकी आत्मा पर पड़ने वाली चोट थी। इसी बीच एक और तूफान आया मां का साया सिर से उठ गया। घर की रौशनी बुझ गई। बेटा अभी बच्चा ही था, पर जिंदगी ने उसे बड़ा बना दिया। मां के जाने के बाद घर की जिम्मेदारी और भारी हो गई। बड़ी बहन ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी।
अपने सपनों को समेटकर भाई के सपनों को सींचने लगी। ये त्याग किसी किताब में नहीं लिखा जाता ये त्याग घर की दीवारों में बस जाता है। बेटा पढ़ना चाहता था। पर पढ़ाई आसान नहीं थी कभी बिजली नहीं, कभी जगह नहीं, कभी मन नहीं क्योंकि पेट खाली होता था। पहली ही कोशिश में देश की सबसे कठिन परीक्षा में
उस लड़के ने सफलता पाई यूपीएससी-2006 में एआईआर-48।
जिसे लोग रिक्शावाले का बेटा कहते थे, आज वही देश की सेवा करने वाला अधिकारी बन गया। कहानी सिर्फ एक इंसान की नहीं है। ये कहानी हर उस घर की है, जहां हालात कमजोर हैं,
लेकिन इरादे मजबूत। अगर आज कोई आपसे कहता है
तू क्या कर लेगा? तो इस कहानी को याद करना। क्योंकि
मंजिल आपकी जाति नहीं देखती, आपका हालात नहीं देखती
मंजिल सिर्फ आपका जज्बा देखती है। रिक्शे पर बैठा सपना, जब हिम्मत के पहियों से चलता है तो एक दिन सचिवालय तक पहुंच ही जाता है।

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