
बेरुआरबारी (बलिया)। श्रीमद्भागवत महापुराण की दिव्य कथा केवल सुनने का विषय नहीं है। बल्कि जीवन को शुद्ध, सरल और सार्थक बनाने का मार्ग है। भागवत हमें सिखाती है कि भक्ति, प्रेम, करुणा और सेवा ही मानव जीवन का सच्चा उद्देश्य है। उक्त बातें क्षेत्र राष्ट्रीय इंटर कालेज करम्बर के प्रांगण में चल रहे श्रीमद् भागवत साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ कथा के दौरान अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भागवत रत्न आचार्य पंडित विमल कृष्ण पाठक ने उपस्थित सैकड़ों भक्तों को भक्ति रस का पान कराते हुए बताया कि भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं हमें यह स्मरण कराती हैं कि अहंकार त्यागकर, विश्वास और समर्पण के साथ यदि हम प्रभु का स्मरण करें, तो जीवन के सभी दुःख स्वतः दूर हो जाते हैं।

यहां बैठकर कथा श्रवण करना तभी सफल है, जब हम इसके संदेश को अपने आचरण में उतारें। कथा के दौरान श्री पाठक ने बताया कि धुंधकारी एक ब्राह्मण का पुत्र था उसके पिता का नाम आत्मदेव और माता का नाम धुंधुली था। आत्मदेव अत्यंत धार्मिक, सदाचारी और भगवान विष्णु के भक्त थे लेकिन उनकी पत्नी धुंधुली स्वभाव से क्रोधी और अधार्मिक थी। जिसके चलते धुंधकारी ने मदिरापान, जुआ, वेश्यागमन आदि बुराइयों को अपनाया। उसने अपने माता-पिता को अत्यंत दुःख दिया और अंततः उन्हें मार डाला।
अपने पापों के कारण धुंधकारी की मृत्यु अत्यंत कष्टदायक हुई और वह प्रेत योनि में चला गया। कई वर्षों बाद, जब गोकर्ण जी भागवत कथा का आयोजन कर रहे थे, तब धुंधकारी प्रेत रूप में वहाँ आया। कथा के सात दिनों तक उसने भागवत का श्रवण किया। भागवत कथा के प्रभाव से उसके पाप नष्ट हुए और सातवें दिन उसे प्रेत योनि से मुक्ति प्राप्त हुई तथा वह दिव्य विमान से वैकुंठ को चला गया।

