
बलिया। जननायक चन्द्रशेखर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नरेन्द्र कुमार शुक्ल के संरक्षण में प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल की पुण्यतिथि के अवसर पर डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल: व्यक्तित्व और कृतित्व विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया। मुख्य वक्ता हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. प्रवीण नाथ यादव ने डॉ. जायसवाल के व्यक्तित्व पर विस्तृत चर्चा करते हुए बताया कि ये ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में परास्नातक करने के साथ ही बार एट लॉ की उपाधि और चीनी भाषा में डिप्लोमा की योग्यता भी अर्जित किया। इनका पारिवारिक व्यवसाय मिर्जापुर, पटना और कलकत्ता में फलफूल रहा था पर उन्होंने अपनी मेधा को भारतीय इतिहास एवं संस्कृति पर गंभीर शोध करने में लगाया।

उन्होंने भारत की गणतंत्रात्मक व्यवस्था की प्राचीनता, मौर्य और मौर्याेत्तर काल खण्ड सहित उत्तर भारत के प्राचीन राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास पर प्रशंसनीय शोध कार्य किया। वीए स्मिथ ने 1904 में प्रकाशित दि अर्ली हिस्ट्री ऑफ इण्डिया में मौर्यात्तर युग को अंधकार युग की संज्ञा दी थी जिसे डॉ. जायसवाल ने तथ्यों के आधार पर खण्डित किया। उन्होंने खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख, अशोक के अभिलेखों सहित मुद्राओं पर भी प्रशंसनीय कार्य किया। उनके निबंधों का संग्रह दि हिन्दू पॉलिटी का प्रकाशन 1924 में पुस्तक के रूप में हुआ जिसमें इन्होंने साम्राज्यवादी इतिहास लेखन के इस विचार का तथ्यों के आधार पर वैज्ञानिक तरीके से खण्डन किया कि भारत हमेशा निरंकुश रूप से शासित होता रहा है।
डॉ. प्रवीण ने कहा कि इनकी कानून और संस्कृत की भी पर्याप्त योग्यता इनके व्यक्तित्व के विविधता का सशसक्त उदाहरण है जिसकी चर्चा रामधारी सिंह दिनकर और राहुल सांकृत्यायन नें भी गंभीरता से किया है। डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल स्मृति स्वर्ण पदक प्राप्त छात्रा विनीता सिंह ने डॉ. जायसवाल के राष्ट्रवादी इतिहास लेखन पर विस्तृत प्रकाश डाला। व्याख्यान में विषय प्रवर्तन डॉ. शैलेन्द्र कुमार सिंह ने और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. विनीत कुमार सिंह ने किया। संचालन सुधांशु पाण्डेय तथा स्वागत नवनीत पाण्डेय ने किया। अध्यक्षता निदेशक शैक्षणिक डॉ. पुष्पा मिश्रा ने किया।

