
बलिया। सूर्यषष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। इस पर्व को वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में व दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है।
धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
ज्योतिषाचार्य, डॉ. अखिलेश कुमार उपाध्याय ने बताया कि छठ पूजा में सूर्यदेव की पूजा की जाती है और उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। सूर्य प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देने वाले देवता हैं, जो पृथ्वी पर सभी प्राणियों के जीवन का आधार हैं। छठी मैया सूर्य व छठी मैया का सम्बन्ध भाई-बहन का है। मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने के कारण इनका नाम षष्ठी पड़ा।
वे कार्तिकेय की पत्नी भी हैं और उन्हें देवताओं की देवसेना भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, पहली पूजा सूर्य ने ही की थी। षष्ठी माता को ब्रह्मा की मानस पुत्री माना जाता है और शास्त्रों के अनुसार वे संतों की रक्षा करती हैं। नवरात्रि की षष्ठी तिथि पर इन्हें कात्यायनी के रूप में भी पूजा जाता है। बिहार व झारखण्ड की स्थानीय भाषा में इन्हें छठ मैया कहा जाता है।
वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण
खगोलीय परिवर्तन वैज्ञानिक दृष्टि से षष्ठी के दिन विशेष खगोलीय परिवर्तन होता है, जिससे सूर्य की पराबैंगनी किरणें असामान्य रूप से एकत्र होती हैं। इन किरणों के कुप्रभाव से बचने के लिए सूर्य की उषा व प्रत्यूषा की उपस्थिति में जल में खड़े रहकर छठ व्रत किया जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है, किन्तु कुछ पुरुष भी इसे रखते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।

