
बलिया। जिस पुलिस से बड़े-बड़े अपराधी खौफ खाते हैं, उसी पुलिस महकमे का एक थाना करीब तीन दशक तक एक अनदेखे डर की कहानी समेटे रहा। जनपद के भीमपुरा थाने का एक कमरा पिछले 31 वर्षों से बंद पड़ा था। इस दौरान कई थानाध्यक्ष आए और चले गए, लेकिन किसी ने भी उस कमरे को खुलवाने की हिम्मत नहीं जुटाई। अब पुलिस अधीक्षक ओमवीर सिंह की पहल पर बंद कमरे को खोलकर उसकी मरम्मत और रंगाई-पुताई कराई जा रही है।
फिल्मी कहानी जैसी इस घटना की शुरुआत वर्ष 1995 के पंचायत चुनाव के दौरान हुई थी। भीमपुरा थाना क्षेत्र के प्रेमरजा गांव निवासी 22 वर्षीय अटल बिहारी मिश्र, जो उस समय बीएचयू में एमए अंतिम वर्ष के छात्र थे, सात अप्रैल 1995 को वाराणसी से ट्रेन द्वारा इंदारा-भटनी रेलखंड के किड़िहिरापुर रेलवे स्टेशन पर उतरे थे। परिजनों के अनुसार, गांव लौटते समय तत्कालीन थानाध्यक्ष रामबड़ाई यादव ने उन्हें रास्ते में पकड़ लिया और थाने ले जाकर बंद कर दिया।
आरोप है कि अटल बिहारी पर बम फेंकने का आरोप लगाते हुए पुलिस ने उनकी पिटाई की, जिससे अंडरकस्टडी उनकी मौत हो गई। घटना के बाद क्षेत्र में आक्रोश फैल गया और ग्रामीणों ने थाने पर पहुंचकर जमकर हंगामा किया। किसी तरह स्थिति पर काबू पाया गया, लेकिन मामला पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना रहा।
घटना के बाद जिस कमरे में अटल बिहारी को रखा गया था, उसे बंद कर दिया गया। बताया जाता है कि कमरे के दरवाजे पर ‘थानाध्यक्ष कक्ष’ की जगह ‘स्टोर’ लिखवा दिया गया था, लेकिन अंदर से वह कमरा वर्षों तक बंद ही रहा।
पुलिस अधीक्षक ओमवीर सिंह ने बताया कि
अब करीब 31 साल बाद कमरे को खोलकर उसकी मरम्मत और रंगाई-पुताई कराई जा रही है। बताया कि कमरा इतने वर्षों तक क्यों बंद रहा, इसकी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।

